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मध्य प्रदेश मे बिधानसभा चुनाव शिवराज के 15 सालो का हिसाब करेगी जनता ,देखे खास रिपोर्ट.... Featured

Written by  Published in Madhay Pradesh Wednesday, 28 November 2018 01:11

स्मार्ट इंडिया न्यूज युवराज सिह

/मध्यप्रदेश विधानसभा की 230 और मिजोरम की 40 सीटों पर बुधवार को वोट डाले जाएंगे। मध्यप्रदेश में भाजपा पिछले 15 सालों से सत्ता में है। कांग्रेस उसे कड़ी टक्कर दे सकती है। वजह मालवा-निमाड़ और मध्य भारत की 105 सीटें हैं। अगर यहां वोट स्विंग होता है, तो भाजपा को फिर से सरकार बनाने में मुश्किल हो सकती है। लगातार तीन चुनावों से यहां बढ़त बनाकर भाजपा सरकार बनाते आ रही है। वहीं, मिजोरम में सत्ताधारी कांग्रेस के लिए यह चुनाव बेहद अहम है। कांग्रेस मिजोरम के अलावा पंजाब, पुडुचेरी और कर्नाटक में सत्ता में है। दोनों राज्यों में सुबह सात बजे से शाम पांच बजे तक मतदान होगा। परिणाम 11 दिसंबर को आएंगे। 

देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें सर्वाधिक महत्व मध्य प्रदेश का माना जा रहा है क्योंकि इन पांच राज्यों में सर्वाधिक 230 विधानसभा सीटें और सबसे ज्यादा 29 लोकसभा सीटें इसी राज्य में हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में पांच करोड़ मतदाता 2907 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करेंगे, जिनमें 1102 निर्दलीय उम्मीदवार शामिल हैं। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा पिछले डेढ़ दशक से सत्तासीन है किन्तु गुजरात के बाद 'संघ की दूसरी प्रयोगशाला' माने जा रहे इस राज्य में इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही कुछ क्षेत्रीय दलों की चुनौतियों से भी जूझना पड़ेगा। भाजपा जहां अपनी जीत का चौका लगाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है, वहीं कांग्रेस अपना 15 साल लंबा वनवास खत्म कर सत्ता वापसी के लिए बेकरार है। 

दोनों ही प्रमुख दलों के बीच कांटे का मुकाबला तय माना जा रहा है लेकिन दोनों के लिए न केवल भीतरघात से निपटना बड़ी चुनौती बन गया है बल्कि सपा, बसपा सहित कई क्षेत्रीय दल भी इनका खेल बिगाड़ने के लिए मैदान में कूद चुके हैं। भाजपा और कांग्रेस के सरकार बनाने के समीकरण अब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेंगे कि बागी उम्मीदवार कितनी सीटों पर जीत हासिल करते हैं और दोनों प्रमुख दलों के परम्परागत वोटबैंक में सेंधमारी कर उनकी जीत का गणित भी प्रभावित करेंगे।    230 सदस्यीय मध्य प्रदेश विधानसभा के 2013 के चुनाव में भाजपा को 44.88 फीसदी मतों के साथ 165 सीटें, कांग्रेस को 36.38 फीसदी मतों के साथ 58 जबकि अन्य को 11.67 फीसदी मतों के साथ 7 सीटें प्राप्त हुई थी। 2008 के चुनाव में भाजपा को 38 फीसदी मतों के साथ 143 सीटें जबकि कांग्रेस को करीब 32 फीसदी मतों के साथ 71 सीटों पर जीत मिली थी। 

देखा जाए तो जहां पिछले 10 वर्षों में भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ने के साथ ही सीटों की संख्या भी बढ़ी, वहीं कांग्रेस का मत प्रतिशत तो बढ़ा किन्तु सीटें कम हो गई। इस बार दोनों दलों की नजरें उन सीटों पर खासतौर से केन्द्रित हैं, जहां पिछले चुनाव में हार-जीत का अंतर बहुत कम मतों का रहा था। कांग्रेस के 11 प्रत्याशी 2013 के चुनाव में महज एक हजार से भी कम मतों के अंतर से हार गए थे जबकि 30 प्रत्याशी ऐसे थे, जो ढ़ाई हजार के अंतर से भाजपा प्रत्याशियों से परास्त हो गए थे। भाजपा के सिर्फ  6 प्रत्याशी ही ऐसे थे, जो एक हजार मतों के अंतर से पराजित हुए थे। इससे पहले जितने भी चुनाव हुए, क्षेत्रीय दल चुनाव परिणामों पर कोई खास असर नहीं डाल सके किन्तु इस बार स्थितियां काफी बदली हुई हैं। वैसे तो 1972 से ही यहां चुनावी मुकाबला दो दलीय रहा है किन्तु 1990 में दो सीटें जीतने के बाद से बसपा अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज कराती रही है, जो 1996 में 2 लोकसभा तथा 1993 और 1998 में 11 विधानसभा सीटें जीतने में सफल रही थी। उसके बाद कयास लगाए जाने लगे थे कि बसपा राज्य में तीसरी शक्ति के रूप में तेजी से उभरेगी किन्तु ऐसा संभव नहीं हुआ और पिछले चुनाव में बसपा 6.29 फ ीसदी मत हासिल कर सिर्फ  4 सीटों पर ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकी। हालांकि बसपा की राज्य की 15 फ ीसदी अनुसूचित जातियों पर अच्छी पकड़ है। सपा 1993 में एक सीट जीतकर पहली बार विधानसभा में पहुंची थी। 1998 में 4 और 2003 में 7 सीटें प्राप्त कर किन्तु 2013 में महज 1.2 फीसदी मत हासिल कर सपा बुरी तरह पिछड़ गई थी लेकिन इस बार वह फिर से अपने ही बल पर जोर आजमाइश के लिए मैदान में उतरी है।

बसपा और सपा के अलावा भी कई दल मैदान में ताल ठोंक रहे हैं, जिनकी उपस्थिति को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिसका प्रदेश के कई जिलों में अच्छा प्रभाव है। प्रदेश में करीब 80 सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासी समाज की बहुलता है और ऐसे कई इलाकों में इस पार्टी की मजबूत पकड़ है। पिछले चुनाव में इस पार्टी ने महज एक फीसदी मत प्राप्त किए थे किन्तु आदिवासी क्षेत्रों में ज्यादातर सीटों पर 18-20 हजार तक वोट हासिल कर हर किसी को चौंका दिया था।

'जायस' (जय आदिवासी युवा शक्ति) पहली बार चुनावी महासमर में शामिल हुई है, जिसने मालवा-निमार की 28 ऐसी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं, जिनमें 22 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। इन क्षेत्रों में 22 फीसदी आदिवासी समुदाय की भी हिस्सेदारी है, जिन पर जायस की अच्छी पकड़ मानी जाती है। कहा जाता है कि जायस कांग्रेस के दिमाग की ही उपज है। एक अन्य पार्टी 'सामान्य पिछड़ा अल्पसंख्यक समाज कल्याण संस्था' (सपाक्स) भी सभी 230 सीटों पर अपने प्रत्याशियों के साथ मैदान में है, जिसकी सरकारी कर्मियों पर अच्छी पकड़ मानी जाती है। बहुत सारे पूर्व सरकारी कर्मचारी इसके सदस्य हैं और माना जा रहा है कि दलित एक्ट में बदलाव से नाराज सवर्णों के भाजपा के वोटबैंक में सेंध लगाने में यह दल भूमिका निभाएगा। बहरहाल, मध्य प्रदेश में जहां मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच होना तय है, वहीं कुछ क्षेत्रीय दल दोनों दलों के बीच के इस मुकाबले को मत विभाजन के जरिये प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाएंगे। 

              

 

2013 में मालवा-निमाड़ की 66 सीटों में से भाजपा को 56 और कांग्रेस को नौ सीटें मिली थीं और अन्य के खाते में एक सीट गई थी। वहीं, मध्य भारत की 39 में से भाजपा को 32, कांग्रेस को छह और अन्य को एक सीट मिली थी। मालवा-निमाड़ में भाजपा अगर 50 से कम सीटें लाती है, तो उसकी सरकार बनाने की संभावनाएं कमजोर हो जाएंगी। कांग्रेस उसे 45 या उससे कम पर रोकने में सफल रही तो 15 साल बाद फिर सत्ता में आ सकती है। 

 

मालवा-निमाड़ में बढ़त बनाकर उमा-शिवराज ने बनाई सरकार : 1998 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मालवा-निमाड़ से 47 सीट जीतकर सरकार बनाई थी। तब कांग्रेस को 50% वोट मिले थे। भाजपा 44% वोट शेयर पाने के बाद भी 16 सीटें ही जीत पाई थी। 2003 में भाजपा ने 51 सीटें जीती थीं। मुख्यमंत्री उमा भारती के नेतृत्व पार्टी ने जीत दर्ज की थी। कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार को एंटीइंकम्बेंसी का सामना करना पड़ा था। पार्टी को सिर्फ 12 सीटें ही मिली थीं। 2008 में कांग्रेस को 24 सीटें जीतीं। वहीं, भाजपा के खाते में 41 सीटें गई थीं। भाजपा एक बार फिर सरकार बनाने में कामयाब रही।सीटों पर रहेगी नजर


1. बुधनी :  शिवराज सिंह (भाजपा) vs  अरुण यादव (कांग्रेस): शिवराज यहां से पांचवीं बार चुनाव लड़ रहे हैं। अरुण पूर्व उप मुख्‍यमंत्री सुभाष यादव के बड़े बेटे हैं। यह उनका पहला विधानसभा चुनाव है। पहले सांसद रह चुके हैं। 
2. होशंगाबाद: सीतासरन शर्मा (भाजपा) vs सरताज सिंह (कांग्रेस)। सरताज के कांग्रेस में शामिल होने पर यह सीट भाजपा के लिए काफी अहम हो गई है।
3. इंदौर 3: आकाश विजयवर्गीय (भाजपा) vs उषा ठाकुर (कांग्रेस)। आकाश, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं। 
4. भोजपुर: सुरेंद्र पटवा (भाजपा) vs सुरेश पचौरी (कांग्रेस)।  पिछले चुनाव में पचौरी को पटवा ने 20,149 वोट से हराया था।
5. चाचौड़ा : ममता मीणा (भाजपा) vs लक्ष्मण सिंह (कांग्रेस)। लक्ष्मण सिंह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के छोटे भाई हैं। 
6. विजयराघवगढ़: संजय पाठक (भाजपा) vs (पद्मा शुक्ला)। पाठक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए है। पाठक सबसे अमीर उम्मीदवार हैं। वहीं, पद्मा ने पिछले दिनों भाजपा छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ली है।

 

मोदी ने 10, राहुल ने 21 तो शिवराज ने 149 सभाएं कीं 
प्रधानमंत्री मोदी ने 10, तो अमित शाह ने 23 सभाएं और 6 रोड शो किए। वहीं, राहुल गांधी ने 21 सभाएं और दो रोड शो किए। वहीं, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 149 सभाएं और करीब एक दर्जन रोड शो किए। कमलनाथ ने 55, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 110 सभाएं और 12 रोड शो किए। शाह ने अपने दौरों में महाकाल, मैहर सहित कई मंदिरों में पूजा अर्चना की। वहीं राहुल ने महाकाल, दतिया के पीतांबरा पीठ के दर्शन किए। ग्वालियर प्रवास के दौरान उन्होंने मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा में भी मत्था टेका।

 

महिला मतदाता 2 करोड़ से ज्यादा

 

कुल प्रत्याशी:  2907 
मतदाता: 5 करोड़, 4 लाख से ज्यादा 
पुरुष मतदाता: 2 करोड़ 62 लाख
महिला मतदाता: 2 करोड़ 41 लाख  
थर्ड जेंडर मतदाता: 1389

 

आप और सपाक्स का पहला चुनाव
भाजपा सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि कांग्रेस ने एक सीट अपने साझेदार लोकतांत्रिक जनता दल को छोड़कर 229 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। आम आदमी पार्टी और सपाक्स ऐसी पार्टियां हैं, जो प्रदेश में पहली बार चुनावी मैदान में हैं। आप 207 सीटों, सपाक्स 109, बसपा 227, गोंगपा 73 और सपा 52 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

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